राज्यपाल
भारतीय संविधान ने भारत को "राज्यों का एक संघ" (अनुच्छेद-1) के रूप में परिभाषित किया है, जहाँ द्वैध शासन व्यवस्था के अंतर्गत शक्तियों का वितरण केंद्र और राज्यों के बीच स्पष्ट रूप से किया गया है । संविधान की सातवीं अनुसूची में विधायी विषयों को केन्द्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया गया है, जिससे संघीय ढांचे को वैधानिक आधार प्राप्त होता है ।
अनुच्छेद 152 संविधान के भाग 6 (जो राज्यों से संबंधित है) की शुरुआत करता है और "राज्य" शब्द को परिभाषित करता है । "इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, 'राज्य' पद के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य नहीं है ।"
भारत में संघीय ढांचे को कार्यान्वित करने में राज्यपाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो संविधान के अनुच्छेद 153 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक नाममात्र प्रमुख होता है । राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक संवैधानिक सेतु की भूमिका निभाता है, विशेषकर जब वह केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है ।
भारत में संघीय व्यवस्था अपनाई गई हैं जिसके अनुसार दो स्तर पर शासन संचालित किया जाता है-
i. केन्द्रीय स्तर पर (केन्द्रीय कार्यपालिका) ii. राज्य स्तर पर (राज्य कार्यपालिका)
राज्य कार्यपालिका का उल्लेख संविधान के अध्याय-5 के भाग-6, अनुच्छेद 152-167 तक किया गया है ।
राज्य कार्यपालिका के अंतर्गत राज्यपाल, राज्य मंत्रिपरिषद तथा महाधिवक्ता शामिल होते हैं ।
आजादी के बाद राजस्थान में एकीकरण के पश्चात् 30 मार्च 1949 को राजप्रमुख व महाराजप्रमुख का पद सृजित किया गया ।
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 7वें संविधान संशोधन के तहत 1 नवम्बर 1956 को राजप्रमुख का पद समाप्त कर दिया गया । 25 अक्टूबर 1956 ई. को श्री गुरुमुख निहाल सिंह को राजस्थान का प्रथम राज्यपाल नियुक्त किया गया ।
राज्यपाल के अन्य नाम - राज्य का संवैधानिक मुखिया, विधित अध्यक्ष, राज्य का प्रमुख ।
श्रीमती सरोजिनी नायडू - राज्यपाल सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया के समान है ।
श्री प्रकाश - राज्यपाल को छूटी हुई जगह पर हस्ताक्षर करने के अतिरिक्त कोई अधिकार प्राप्त नहीं है ।
श्रीमती विजयालक्ष्मी पंडित - पद नही वेतन के आकर्षण के कारण ही कोई व्यक्ति राज्यपाल बनना स्वीकार करता है ।
डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या - राज्यपाल का पद अतिथि सत्कार तथा राष्ट्रपति को एक पखवाड़े का प्रतिवेदन देने के लिए है ।
"प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा परन्तु इस अनुच्छेद की कोई बात एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों के लिए राज्यपाल नियुक्त किए जाने से निवारित नहीं करेगी ।" यह अनुच्छेद एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त होने से प्रतिबंधित नही करती है ।
7 वें संविधान संशोधन 1956 के तहत एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है । राज्य का प्रथम नागरिक राज्यपाल होता है ।
अनुच्छेद 154 - राज्य की कार्यपालिका शक्ति
अनुच्छेद 154 (1) :- राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा ।
अनुच्छेद 154 (2) :- इस अनुच्छेद की कोई बात-
(क) किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी अन्य प्राधिकारी को प्रदान किए गए कृत्य राज्यपाल को अंतरित करने वाली नहीं समझी जाएगी; या
(ख) राज्यपाल से अधीनस्थ किसी प्राधिकारी को विधि द्वारा कृत्य प्रदान करने से संसद या राज्य के विधानमंडल को निवारित नहीं करेगी
निष्कर्ष
राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी। राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग संविधान के प्रावधानों के अनुसार या तो स्वयं करेंगे या अपने अधीनस्थ अधिकारियों (जैसे मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद) के माध्यम से करेंगे। इस अनुच्छेद की कोई भी बात किसी अन्य प्राधिकारी को पहले से ही कानून द्वारा दी गई शक्तियों को राज्यपाल को हस्तांतरित नहीं करेगी। संसद या राज्य के विधानमंडल को यह अधिकार होगा कि वे कानून बनाकर राज्यपाल के अलावा किसी अन्य प्राधिकारी को कार्य सौंप सकें।
प्रमुख प्रावधान :
राजस्थान की राज्यकार्यपालिका और राज्यपाल से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित महत्वपूर्ण अभ्यास प्रश्न नीचे दिए गए हैं। प्रश्नों के उत्तर अंत में दिए गए हैं।
भारत में संघीय ढांचे को कार्यान्वित करने में राज्यपाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो संविधान के अनुच्छेद 153 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक नाममात्र प्रमुख होता है । राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक संवैधानिक सेतु की भूमिका निभाता है, विशेषकर जब वह केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है ।
भारत में संघीय व्यवस्था अपनाई गई हैं जिसके अनुसार दो स्तर पर शासन संचालित किया जाता है-
i. केन्द्रीय स्तर पर (केन्द्रीय कार्यपालिका) ii. राज्य स्तर पर (राज्य कार्यपालिका)
राज्य कार्यपालिका का उल्लेख संविधान के अध्याय-5 के भाग-6, अनुच्छेद 152-167 तक किया गया है ।
राज्य कार्यपालिका के अंतर्गत राज्यपाल, राज्य मंत्रिपरिषद तथा महाधिवक्ता शामिल होते हैं ।
आजादी के बाद राजस्थान में एकीकरण के पश्चात् 30 मार्च 1949 को राजप्रमुख व महाराजप्रमुख का पद सृजित किया गया ।
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 7वें संविधान संशोधन के तहत 1 नवम्बर 1956 को राजप्रमुख का पद समाप्त कर दिया गया । 25 अक्टूबर 1956 ई. को श्री गुरुमुख निहाल सिंह को राजस्थान का प्रथम राज्यपाल नियुक्त किया गया ।
राज्यपाल के अन्य नाम - राज्य का संवैधानिक मुखिया, विधित अध्यक्ष, राज्य का प्रमुख ।
राज्यपाल की स्थिति के बारे में कथन
श्री के. एम. मुंशी - राज्यपाल संवैधानिक औचित्य का प्रहरी व कड़ी है जो राज्य को केन्द्र के साथ जोड़कर भारत की एकता के लक्ष्य को प्राप्त करता है ।श्रीमती सरोजिनी नायडू - राज्यपाल सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया के समान है ।
श्री प्रकाश - राज्यपाल को छूटी हुई जगह पर हस्ताक्षर करने के अतिरिक्त कोई अधिकार प्राप्त नहीं है ।
श्रीमती विजयालक्ष्मी पंडित - पद नही वेतन के आकर्षण के कारण ही कोई व्यक्ति राज्यपाल बनना स्वीकार करता है ।
डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या - राज्यपाल का पद अतिथि सत्कार तथा राष्ट्रपति को एक पखवाड़े का प्रतिवेदन देने के लिए है ।
राज्यपाल से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 153 - राज्यों के राज्यपाल"प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा परन्तु इस अनुच्छेद की कोई बात एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों के लिए राज्यपाल नियुक्त किए जाने से निवारित नहीं करेगी ।" यह अनुच्छेद एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त होने से प्रतिबंधित नही करती है ।
7 वें संविधान संशोधन 1956 के तहत एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है । राज्य का प्रथम नागरिक राज्यपाल होता है ।
अनुच्छेद 154 - राज्य की कार्यपालिका शक्ति
अनुच्छेद 154 (1) :- राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा ।
अनुच्छेद 154 (2) :- इस अनुच्छेद की कोई बात-
(क) किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी अन्य प्राधिकारी को प्रदान किए गए कृत्य राज्यपाल को अंतरित करने वाली नहीं समझी जाएगी; या
(ख) राज्यपाल से अधीनस्थ किसी प्राधिकारी को विधि द्वारा कृत्य प्रदान करने से संसद या राज्य के विधानमंडल को निवारित नहीं करेगी
निष्कर्ष
राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी। राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग संविधान के प्रावधानों के अनुसार या तो स्वयं करेंगे या अपने अधीनस्थ अधिकारियों (जैसे मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद) के माध्यम से करेंगे। इस अनुच्छेद की कोई भी बात किसी अन्य प्राधिकारी को पहले से ही कानून द्वारा दी गई शक्तियों को राज्यपाल को हस्तांतरित नहीं करेगी। संसद या राज्य के विधानमंडल को यह अधिकार होगा कि वे कानून बनाकर राज्यपाल के अलावा किसी अन्य प्राधिकारी को कार्य सौंप सकें।
सातवां संविधान संशोधन अधिनियम, 1956
सातवां संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 मुख्य रूप से राज्य पुनर्गठन आयोग (फजल अली आयोग) की सिफारिशों को कानूनी रूप देने के लिए लागू किया गया था। यह संशोधन 1 नवंबर, 1956 से प्रभावी हुआ।प्रमुख प्रावधान :
राज्यों के वर्गीकरण की समाप्ति और पुनर्गठन : मूल संविधान में राज्यों को भाग A, B, C और D चार श्रेणियों में विभाजित किया गया था। इस संशोधन के माध्यम से राज्यों के बीच किए गए इस भेद को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। भारत के संपूर्ण क्षेत्र को एक नए स्वरूप में 14 राज्यों और 6 संघ राज्य क्षेत्रों में पुनर्गठित किया गया। |
राज्यपाल का पद (अनुच्छेद 153 में संशोधन) : मूल संविधान में एक राज्य के लिए एक राज्यपाल का प्रावधान था। इस संशोधन के माध्यम से यह व्यवस्था की गई कि एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। |
उच्च न्यायालयों के संबंध में सुधार : अनुच्छेद 231 :- संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह कानून बनाकर दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही साझा उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है। उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार का विस्तार संघ राज्य क्षेत्रों (UTs) तक करने की शक्ति दी गई।
अनुच्छेद 224 :- उच्च न्यायालयों में कार्य की अधिकता को देखते हुए दो वर्ष तक की अवधि के लिए 'अतिरिक्त न्यायाधीशों' की नियुक्ति का प्रावधान किया गया।
भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष संरक्षण : देश में भाषायी विविधता को सुरक्षित रखने हेतु दो नए अनुच्छेद जोड़े गए-
अनुच्छेद 350 (A) :- प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य बनाया गया कि वह भाषायी अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर शिक्षा उनकी मातृभाषा में देने का प्रयास करे।
अनुच्छेद 350 (B) :- भाषायी अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए एक 'विशेष अधिकारी' की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। |
अन्य संवैधानिक परिवर्तन : रियासतों से संबंधित 'भाग-VII' को संविधान से पूरी तरह हटा दिया गया। लोकसभा की सीटों की संख्या को पुनर्गठित राज्यों के अनुसार संशोधित किया गया (सीटों को बढ़ाकर 525 किया गया था)। राज्यों की विधान परिषदों की अधिकतम सदस्य संख्या को उस राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य संख्या का एक-तिहाई (1/3) निश्चित किया गया (पहले यह एक-चौथाई थी)। उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त स्थायी न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों (जहाँ वे स्थायी न्यायाधीश नहीं रहे हों) में वकालत करने की अनुमति दी गई।
अनुच्छेद 155 - राज्यपाल की नियुक्ति
"राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त करेगा।" राज्यपाल का चुनाव जनता द्वारा नहीं होता और न ही प्रत्यक्ष रूप से राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाता है। इसकी नियुक्ति पूरी तरह से राष्ट्रपति (केंद्र सरकार की सलाह पर) द्वारा की जाती है।
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए एक आधिकारिक दस्तावेज जिसे 'वारंट' या 'अधिपत्र' कहा जाता है, के माध्यम से होती है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करें।
राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया
संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार, राष्ट्रपति अपने सभी कार्यों का निर्वहन मंत्रिपरिषद (प्रधानमंत्री के नेतृत्व में) की सलाह पर करते हैं। इसी के तहत केंद्रीय गृह मंत्रालय संभावित नामों की एक सूची तैयार करता है। प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट इस पर अंतिम निर्णय लेते हैं कि किस व्यक्ति को किस राज्य का राज्यपाल बनाया जाएगा। कैबिनेट के निर्णय के बाद प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को संबंधित व्यक्ति की नियुक्ति के लिए औपचारिक सिफारिश भेजते हैं। जब राष्ट्रपति नियुक्ति की फाइल पर हस्ताक्षर कर देते हैं, तब अनुच्छेद 155 के तहत एक औपचारिक दस्तावेज जारी किया जाता है, जिसे 'अधिपत्र' कहा जाता है। अधिपत्र साधारण पत्र नहीं होता। इस पर राष्ट्रपति के स्वयं के हस्ताक्षर और राष्ट्रपति की राजकीय मुद्रा लगी होती है।
राज्यपाल का पद (अनुच्छेद 153 में संशोधन) : मूल संविधान में एक राज्य के लिए एक राज्यपाल का प्रावधान था। इस संशोधन के माध्यम से यह व्यवस्था की गई कि एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। |
उच्च न्यायालयों के संबंध में सुधार : अनुच्छेद 231 :- संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह कानून बनाकर दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही साझा उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है। उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार का विस्तार संघ राज्य क्षेत्रों (UTs) तक करने की शक्ति दी गई।
अनुच्छेद 224 :- उच्च न्यायालयों में कार्य की अधिकता को देखते हुए दो वर्ष तक की अवधि के लिए 'अतिरिक्त न्यायाधीशों' की नियुक्ति का प्रावधान किया गया।
भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष संरक्षण : देश में भाषायी विविधता को सुरक्षित रखने हेतु दो नए अनुच्छेद जोड़े गए-
अनुच्छेद 350 (A) :- प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य बनाया गया कि वह भाषायी अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर शिक्षा उनकी मातृभाषा में देने का प्रयास करे।
अनुच्छेद 350 (B) :- भाषायी अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए एक 'विशेष अधिकारी' की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। |
अन्य संवैधानिक परिवर्तन : रियासतों से संबंधित 'भाग-VII' को संविधान से पूरी तरह हटा दिया गया। लोकसभा की सीटों की संख्या को पुनर्गठित राज्यों के अनुसार संशोधित किया गया (सीटों को बढ़ाकर 525 किया गया था)। राज्यों की विधान परिषदों की अधिकतम सदस्य संख्या को उस राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य संख्या का एक-तिहाई (1/3) निश्चित किया गया (पहले यह एक-चौथाई थी)। उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त स्थायी न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों (जहाँ वे स्थायी न्यायाधीश नहीं रहे हों) में वकालत करने की अनुमति दी गई।
अनुच्छेद 155 - राज्यपाल की नियुक्ति
"राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त करेगा।" राज्यपाल का चुनाव जनता द्वारा नहीं होता और न ही प्रत्यक्ष रूप से राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाता है। इसकी नियुक्ति पूरी तरह से राष्ट्रपति (केंद्र सरकार की सलाह पर) द्वारा की जाती है।
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए एक आधिकारिक दस्तावेज जिसे 'वारंट' या 'अधिपत्र' कहा जाता है, के माध्यम से होती है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करें।
राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया
संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार, राष्ट्रपति अपने सभी कार्यों का निर्वहन मंत्रिपरिषद (प्रधानमंत्री के नेतृत्व में) की सलाह पर करते हैं। इसी के तहत केंद्रीय गृह मंत्रालय संभावित नामों की एक सूची तैयार करता है। प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट इस पर अंतिम निर्णय लेते हैं कि किस व्यक्ति को किस राज्य का राज्यपाल बनाया जाएगा। कैबिनेट के निर्णय के बाद प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को संबंधित व्यक्ति की नियुक्ति के लिए औपचारिक सिफारिश भेजते हैं। जब राष्ट्रपति नियुक्ति की फाइल पर हस्ताक्षर कर देते हैं, तब अनुच्छेद 155 के तहत एक औपचारिक दस्तावेज जारी किया जाता है, जिसे 'अधिपत्र' कहा जाता है। अधिपत्र साधारण पत्र नहीं होता। इस पर राष्ट्रपति के स्वयं के हस्ताक्षर और राष्ट्रपति की राजकीय मुद्रा लगी होती है।
राष्ट्रपति भवन द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जाती है और इसे भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। केंद्र सरकार संबंधित राज्य के मुख्य सचिव को सूचित करती है कि राष्ट्रपति ने नए राज्यपाल की नियुक्ति कर दी है।राज्यपाल को शपथ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति या उनकी अनुपस्थिति में उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है। शपथ से पहले, राज्य के मुख्य सचिव द्वारा राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए उस 'अधिपत्र' को सबके सामने पढ़कर सुनाया जाता है।
नियुक्ति से संबंधित परम्परा जिनका उल्लेख संविधान में नहीं है-
मुख्यमंत्री की सलाह/परामर्श से राष्ट्रपति, राज्यपाल की नियुक्ति करेगा। राष्ट्रपति किसी व्यक्ति को उस राज्य का राज्यपाल नियुक्त नहीं करेगा जिसका वह मूल निवासी हो। (परम्पराएं संविधान में उल्लेखित नहीं है।) यह पद भारत शासन अधिनियम 1935 से अभिप्रेरित है। राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया कनाडा से ली गई है।
अनुच्छेद 156 - राज्यपाल की पदावधि
अनुच्छेद 156 (1) - राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा। |
अनुच्छेद 156 (2) - राज्यपाल, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा। |
अनुच्छेद 156 (3) - इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्यपाल अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा परन्तु राज्यपाल, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है। |
निष्कर्ष:
राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण करेगा। इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति (केंद्र सरकार की सलाह पर) किसी भी समय राज्यपाल को उनके पद से हटा सकते हैं। राज्यपाल, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकता है। उपर्युक्त प्रावधानों के अधीन रहते हुए, राज्यपाल अपने पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा। अपने 5 वर्ष का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बावजूद, राज्यपाल तब तक अपने पद पर बना रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता।
रघुकुल तिलक (राजस्थान) का मामला
राजस्थान के राज्यपाल रघुकुल तिलक को पद से हटाना भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक घटना थी। यह अनुच्छेद 156(1) यानी "राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत" की शक्ति को दर्शाता है। यह पहला ऐसा प्रमुख मामला था जहाँ एक राज्यपाल को केंद्र सरकार (राष्ट्रपति के माध्यम से) द्वारा सीधे बर्खास्त किया गया था। इससे पहले परंपरा यह थी कि राज्यपाल स्वयं त्यागपत्र दे देते थे या अपना कार्यकाल पूरा करते थे। बाद में बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि राष्ट्रपति किसी भी समय राज्यपाल को हटा सकते हैं, लेकिन यह निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या अनुचित आधारों पर नहीं होना चाहिए। ये दोनों उदाहरण यह प्रमाणित करते हैं कि राज्यपाल का पद निश्चित कार्यकाल (5 वर्ष) के बावजूद पूरी तरह से केंद्र के विश्वास और संवैधानिक निरंतरता पर टिका होता है।
बी.एन. चक्रवर्ती (हरियाणा) का मामला
न्यायमूर्ति बीरेंद्र नारायण चक्रवर्ती हरियाणा के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले राज्यपाल रहे हैं। यह अनुच्छेद 156(3) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो कहता है कि राज्यपाल तब तक पद नहीं छोड़ेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण न कर ले। उनके कार्यकाल के दौरान उत्तराधिकारी की नियुक्ति में देरी होने के कारण वे पद पर बने रहे। यह दर्शाता है कि राज्य में 'संवैधानिक शून्यता' को रोकने के लिए यह प्रावधान कितना आवश्यक है।
नियुक्ति से संबंधित परम्परा जिनका उल्लेख संविधान में नहीं है-
मुख्यमंत्री की सलाह/परामर्श से राष्ट्रपति, राज्यपाल की नियुक्ति करेगा। राष्ट्रपति किसी व्यक्ति को उस राज्य का राज्यपाल नियुक्त नहीं करेगा जिसका वह मूल निवासी हो। (परम्पराएं संविधान में उल्लेखित नहीं है।) यह पद भारत शासन अधिनियम 1935 से अभिप्रेरित है। राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया कनाडा से ली गई है।
अनुच्छेद 156 - राज्यपाल की पदावधि
अनुच्छेद 156 (1) - राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा। |
अनुच्छेद 156 (2) - राज्यपाल, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा। |
अनुच्छेद 156 (3) - इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्यपाल अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा परन्तु राज्यपाल, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है। |
निष्कर्ष:
राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण करेगा। इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति (केंद्र सरकार की सलाह पर) किसी भी समय राज्यपाल को उनके पद से हटा सकते हैं। राज्यपाल, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकता है। उपर्युक्त प्रावधानों के अधीन रहते हुए, राज्यपाल अपने पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा। अपने 5 वर्ष का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बावजूद, राज्यपाल तब तक अपने पद पर बना रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता।
रघुकुल तिलक (राजस्थान) का मामला
राजस्थान के राज्यपाल रघुकुल तिलक को पद से हटाना भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक घटना थी। यह अनुच्छेद 156(1) यानी "राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत" की शक्ति को दर्शाता है। यह पहला ऐसा प्रमुख मामला था जहाँ एक राज्यपाल को केंद्र सरकार (राष्ट्रपति के माध्यम से) द्वारा सीधे बर्खास्त किया गया था। इससे पहले परंपरा यह थी कि राज्यपाल स्वयं त्यागपत्र दे देते थे या अपना कार्यकाल पूरा करते थे। बाद में बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि राष्ट्रपति किसी भी समय राज्यपाल को हटा सकते हैं, लेकिन यह निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या अनुचित आधारों पर नहीं होना चाहिए। ये दोनों उदाहरण यह प्रमाणित करते हैं कि राज्यपाल का पद निश्चित कार्यकाल (5 वर्ष) के बावजूद पूरी तरह से केंद्र के विश्वास और संवैधानिक निरंतरता पर टिका होता है।
बी.एन. चक्रवर्ती (हरियाणा) का मामला
न्यायमूर्ति बीरेंद्र नारायण चक्रवर्ती हरियाणा के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले राज्यपाल रहे हैं। यह अनुच्छेद 156(3) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो कहता है कि राज्यपाल तब तक पद नहीं छोड़ेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण न कर ले। उनके कार्यकाल के दौरान उत्तराधिकारी की नियुक्ति में देरी होने के कारण वे पद पर बने रहे। यह दर्शाता है कि राज्य में 'संवैधानिक शून्यता' को रोकने के लिए यह प्रावधान कितना आवश्यक है।
अनुच्छेद 156 राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियाँ देता है, लेकिन समय के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने इसे "मनमानी शक्ति" बनने से रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
अनुच्छेद 157 - राज्यपाल नियुक्त होने के लिए अर्हताएँ
कोई व्यक्ति राज्यपाल बनने के लिए तभी पात्र होगा यदि वह-
भारत का नागरिक है।
35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका है।
अनुच्छेद 158 - राज्यपाल के पद के लिए शर्तें
अनुच्छेद 158 (1): राज्यपाल संसद के किसी सदन का या पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा।
अनुच्छेद 158 (2): राज्यपाल अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा।
अनुच्छेद 158 (3): "राज्यपाल, बिना किराया दिए अपने शासकीय निवासों के उपयोग का हकदार होगा और ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का भी जो संसद विधि द्वारा अवधारित करे।"
निष्कर्ष :
राज्यपाल संसद के किसी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा। यदि ऐसा कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, तो उसे पद ग्रहण करने की तारीख से सदन में अपनी सीट रिक्त (खाली) माननी होगी। राज्यपाल किसी अन्य लाभ के पद पर नहीं होगा। राज्यपाल बिना किराया दिए अपने आधिकारिक निवास (राजभवन) का उपयोग करने का हकदार होगा। उसे वे सभी वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार प्राप्त होंगे जो संसद कानून द्वारा निर्धारित करे। यदि एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, तो उसे दिया जाने वाला वेतन और भत्ते उन राज्यों के बीच ऐसे अनुपात में बांटे जाएंगे जैसा राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्धारित करें। राज्यपाल की परिलब्धियों और भत्तों में उसके कार्यकाल के दौरान कोई ऐसी कमी नहीं की जाएगी जो उसके लिए हानिकारक हो।
अनुच्छेद 159 - राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
राज्यपाल या उनके कार्यों का निर्वहन करने वाले व्यक्ति को पद ग्रहण करने से पहले उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या, उनकी अनुपस्थिति में, सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश के समक्ष एक निर्धारित प्रारूप में शपथ लेनी होती है या प्रतिज्ञान करना होता है। इस शपथ में वे श्रद्धापूर्वक राज्यपाल के पद का कार्यपालन करने, संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने, और राज्य की जनता की सेवा और कल्याण में लगे रहने का वचन देते हैं।
राज्यपाल की शपथ का प्रारूप
"मैं, (नाम) ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं श्रद्धापूर्वक (राज्य का नाम) के राज्यपाल के पद का कार्यपालन (अथवा राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन) करूँगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूँगा और मैं (राज्य का नाम) की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहूँगा।"
अनुच्छेद 160 - कुछ विशेष और आकस्मिक परिस्थितियों में राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन
यदि कोई ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए जिसका उल्लेख संविधान के इस भाग (अध्याय 2) में नहीं किया गया है, तो वे राज्यपाल के कार्यों को चलाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते हैं। इसमें वैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं जैसे राज्यपाल की अचानक मृत्यु, त्यागपत्र या बीमारी के कारण पद का खाली होना, जिसके लिए संविधान में स्पष्ट रूप से कोई स्थायी नियम नहीं लिखा गया हो। राष्ट्रपति किसी पड़ोसी राज्य के राज्यपाल को अतिरिक्त प्रभार सौंप सकते हैं या किसी अन्य व्यक्ति को अस्थायी रूप से राज्यपाल के कर्तव्यों के निर्वहन के लिए नियुक्त कर सकते हैं।
अनुच्छेद 157 - राज्यपाल नियुक्त होने के लिए अर्हताएँ
कोई व्यक्ति राज्यपाल बनने के लिए तभी पात्र होगा यदि वह-
भारत का नागरिक है।
35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका है।
अनुच्छेद 158 - राज्यपाल के पद के लिए शर्तें
अनुच्छेद 158 (1): राज्यपाल संसद के किसी सदन का या पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा।
अनुच्छेद 158 (2): राज्यपाल अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा।
अनुच्छेद 158 (3): "राज्यपाल, बिना किराया दिए अपने शासकीय निवासों के उपयोग का हकदार होगा और ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का भी जो संसद विधि द्वारा अवधारित करे।"
निष्कर्ष :
राज्यपाल संसद के किसी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा। यदि ऐसा कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, तो उसे पद ग्रहण करने की तारीख से सदन में अपनी सीट रिक्त (खाली) माननी होगी। राज्यपाल किसी अन्य लाभ के पद पर नहीं होगा। राज्यपाल बिना किराया दिए अपने आधिकारिक निवास (राजभवन) का उपयोग करने का हकदार होगा। उसे वे सभी वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार प्राप्त होंगे जो संसद कानून द्वारा निर्धारित करे। यदि एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, तो उसे दिया जाने वाला वेतन और भत्ते उन राज्यों के बीच ऐसे अनुपात में बांटे जाएंगे जैसा राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्धारित करें। राज्यपाल की परिलब्धियों और भत्तों में उसके कार्यकाल के दौरान कोई ऐसी कमी नहीं की जाएगी जो उसके लिए हानिकारक हो।
राज्यपाल का वेतन और पेंशन
राज्यपाल का वेतन संबंधित राज्य की संचित निधि या राज्य के राजकोष पर भारित होता है, वर्तमान में राज्यपाल का वेतन 3,50,000 रुपये प्रतिमाह है। राज्यपाल की सेवानिवृत्ति के पश्चात् पेंशन केन्द्र की संचित निधि पर भारित होती है।अनुच्छेद 159 - राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
राज्यपाल या उनके कार्यों का निर्वहन करने वाले व्यक्ति को पद ग्रहण करने से पहले उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या, उनकी अनुपस्थिति में, सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश के समक्ष एक निर्धारित प्रारूप में शपथ लेनी होती है या प्रतिज्ञान करना होता है। इस शपथ में वे श्रद्धापूर्वक राज्यपाल के पद का कार्यपालन करने, संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने, और राज्य की जनता की सेवा और कल्याण में लगे रहने का वचन देते हैं।
राज्यपाल की शपथ का प्रारूप
"मैं, (नाम) ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं श्रद्धापूर्वक (राज्य का नाम) के राज्यपाल के पद का कार्यपालन (अथवा राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन) करूँगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूँगा और मैं (राज्य का नाम) की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहूँगा।"
अनुच्छेद 160 - कुछ विशेष और आकस्मिक परिस्थितियों में राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन
यदि कोई ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए जिसका उल्लेख संविधान के इस भाग (अध्याय 2) में नहीं किया गया है, तो वे राज्यपाल के कार्यों को चलाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते हैं। इसमें वैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं जैसे राज्यपाल की अचानक मृत्यु, त्यागपत्र या बीमारी के कारण पद का खाली होना, जिसके लिए संविधान में स्पष्ट रूप से कोई स्थायी नियम नहीं लिखा गया हो। राष्ट्रपति किसी पड़ोसी राज्य के राज्यपाल को अतिरिक्त प्रभार सौंप सकते हैं या किसी अन्य व्यक्ति को अस्थायी रूप से राज्यपाल के कर्तव्यों के निर्वहन के लिए नियुक्त कर सकते हैं।
अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
Q1. भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है?
(A) अनुच्छेद 152
(B) अनुच्छेद 153
(C) अनुच्छेद 154(1)
(D) अनुच्छेद 155
Q2. राजस्थान में 1 नवंबर 1956 को 'राजप्रमुख' का पद समाप्त कर 'राज्यपाल' का पद किस संविधान संशोधन अधिनियम के तहत सृजित किया गया?
(A) 1वें संविधान संशोधन
(B) 7वें संविधान संशोधन
(C) 42वें संविधान संशोधन
(D) 44वें संविधान संशोधन
Q3. संविधान के अनुच्छेद 153 में 7वें संविधान संशोधन (1956) द्वारा क्या महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया?
(A) राज्यपाल के वेतन में वृद्धि की गई
(B) एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है
(C) राज्यपाल की न्यूनतम आयु सीमा 30 वर्ष कर दी गई
(D) राज्यपाल की नियुक्ति केवल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर होगी
Q4. राजस्थान के प्रथम राज्यपाल किसे नियुक्त किया गया था?
(A) सवाई मानसिंह द्वितीय
(B) श्री गुरुमुख निहाल सिंह
(C) रघुकुल तिलक
(D) डॉ. सम्पूर्णानंद
Q5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए:
* अनुच्छेद 157 के अनुसार, राज्यपाल पद के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी चाहिए।
* अनुच्छेद 158 के अनुसार, राज्यपाल संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा।
(A) केवल 1 सही है
(B) केवल 2 सही है
(C) 1 और 2 दोनों सही हैं
(D) न तो 1 और न ही 2 सही है
Q6. राज्यपाल की नियुक्ति के संदर्भ में 'अधिपत्र' (Warrant) किसके द्वारा जारी किया जाता है और इसकी घोषणा कौन करता है?
(A) राष्ट्रपति द्वारा जारी किया जाता है तथा राज्य के मुख्य सचिव द्वारा पढ़कर सुनाया जाता है
(B) प्रधानमंत्री द्वारा जारी किया जाता है तथा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा सुनाया जाता है
(C) गृह मंत्रालय द्वारा जारी किया जाता है तथा मुख्यमंत्री द्वारा सुनाया जाता है
(D) संसद द्वारा जारी किया जाता है तथा राज्यपाल स्वयं पढ़ते हैं
Q7. राज्यपाल के संबंध में "सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया के समान" प्रसिद्ध कथन किसका है?
(A) श्री के. एम. मुंशी
(B) डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या
(C) श्रीमती सरोजिनी नायडू
(D) श्रीमती विजयालक्ष्मी पंडित
Q8. यदि एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, तो उसके वेतन और भत्तों का निर्धारण किस प्रकार होता है?
(A) संबंधित राज्य समान रूप से 50-50% वहन करते हैं
(B) राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निर्धारित अनुपात में राज्यों के बीच बांटा जाता है
(C) संपूर्ण वेतन केंद्र सरकार द्वारा दिया जाता है
(D) मुख्य राज्य (जहाँ बड़ा क्षेत्रफल हो) पूरा वेतन देता है
Q9. अनुच्छेद 159 के तहत राज्यपाल को पद एवं गोपनीयता की शपथ किसके द्वारा दिलाई जाती है?
(A) भारत के राष्ट्रपति द्वारा
(B) संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा
(C) संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा
(D) भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा
Q10. राज्यपाल की सेवानिवृत्ति (Retirement) के पश्चात् मिलने वाली पेंशन किस पर भारित होती है?
(A) राज्य की संचित निधि पर
(B) भारत (केंद्र) की संचित निधि पर
(C) आकस्मिकता निधि पर
(D) लोक लेखा निधि पर
उत्तरमाला (Answer Key)
प्रश्न : (सही उत्तर) संक्षिप्त व्याख्या
Q1 : (C) अनुच्छेद 154(1) के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी। |
Q2 : (B) 7वें संविधान संशोधन अधिनियम (1956) के तहत राजप्रमुख का पद समाप्त कर राज्यपाल का पद सृजित किया गया।
Q3 : (B) 7वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 153 में प्रावधान किया गया कि एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल बन सकता है।
Q4 : (B) 25 अक्टूबर 1956 को श्री गुरुमुख निहाल सिंह को राजस्थान का प्रथम राज्यपाल नियुक्त किया गया था। |
Q5 : (C) अनुच्छेद 157 (अर्हताएँ: नागरिकता व 35 वर्ष आयु) एवं अनुच्छेद 158 (शर्ते: सदन का सदस्य न होना व लाभ का पद न लेना) दोनों सही हैं।
Q6 : (A) नियुक्ति अधिपत्र (वारंट) राष्ट्रपति की मुहर व हस्ताक्षर से जारी होता है, जिसे शपथ से पूर्व राज्य के मुख्य सचिव द्वारा पढ़ा जाता है।
Q7 : (C) श्रीमती सरोजिनी नायडू ने राज्यपाल के पद की स्थिति को "सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया" कहा था। |
Q8 : (B) अनुच्छेद 158(3A) के अनुसार दो या अधिक राज्यों का प्रभार होने पर वेतन राष्ट्रपति के आदेशानुसार राज्यों के अनुपात में बंटता है।
Q9 : (B) अनुच्छेद 159 के अनुसार शपथ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठतम न्यायाधीश दिलाते हैं।
Q10 : (B) राज्यपाल का मासिक वेतन (₹3,50,000) राज्य की संचित निधि पर, जबकि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन केंद्र की संचित निधि पर भारित होती है।
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